ख़्वाब टूटे तो क्या ख़्वाब देखे तो थे
वो मोहब्बत के एहसास जागे तो थे
चार पल ही सही कारवाँ तो चला
तू हमारा तो था हम तुम्हारे तो थे
तू ने आवाज़ दी ही नहीं वरना हम
तेरे कूचे में कुछ देर ठहरे तो थे
ग़म नहीं है कि मायूस लौटे हैं हम
शुक्र है तेरी महफ़िल में आए तो थे
क्या शिकायत करें अब किसी से कोई
हादसे चाहतों में गुज़रने तो थे
मैं अकेला नहीं था कि तन्हाई में
साथ गुज़रे दिनों के उजाले तो थे
कोई क्यूँ दे तुम्हें ज़िंदगी का हिसाब
हम जहाँ में यूँ ही दर-ब-दर थे तो थे
ये अलग बात है कुछ भी हासिल नहीं
हम भी उस नगरी इक उम्र भटके तो थे
— MIR SHAHRYAAR















