देख कर तुझ को मुझ को सुकूँ मिल रहा

हर घड़ी इक नया सा जुनूँ मिल रहा

जिन को मैं सोचता था कि बे-ग़ैर हैं
उन की बातों में मुझ को सुकूँ मिल रहा

क़द्र अपनी ही की जब न हम ने कभी
ग़ैर की आँख में क्यूँ फ़ुजूँ मिल रहा

तेरे पहलू में हर ज़ख़्म भर से गए
तेरी सोहबत से जज़्बा मज़ूँ मिल रहा

अब न रस्ते डराते हैं तनहाई में
तेरे साए का जैसे सहूँ मिल रहा

लफ़्ज़ कम पड़ रहे हैं बयानों में अब
जो तुझी से मिला है फुज़ूँ मिल रहा

मैं 'मुसाफ़िर' हूँ पर मैं ठहरता नहीं
हर सफ़र में मुझे इक सकूँ मिल रहा

— Vikas Shah musafir

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