कुछ न था ग़म मेरी तन्हाई में
फिर भी कुछ बात थी गहराई में
तेरी यादें कहीं चुप-चाप रहीं
जैसे रौशन सी हो परछाई में
मैं ने खोया तुझे इस ढब से की
गिर रहा हूँ मैं किसी खाई में
लोग कहते हैं ये अच्छा है सब
क्या मिला है उसे अच्छाई में
दिल तो सुनता है ये आवाज़ें पर
कौन रहता वहाँ सुनवाई में
— Vikas Shah musafir















