ये सूनी रात ख़ामोशी सितारे चाँद साया
तेरे जाने पे ही तो उजड़ा है मेरा ठिकाना
तेरी ख़ुशबू से लिपटी एक चादर थी उदासी
मैं ओढ़े बैठा था तन्हाइयों का इक फ़साना
कभी जिस मोड़ पर तू मुस्कुरा कर चल पड़ी थी
वहीं पे अब खड़ा हूँ ले के अश्कों का ख़ज़ाना
हवा से जब भी उठता है कभी तेरा कोई नाम
तो बिखरे लफ़्ज़ भी कहते हैं तू था इक बहाना
— Vikas Shah musafir















