
क्या कहूँ क्या खूब लिक्खा है
भूख को महबूब लिक्खा है
संग जो सिर आके टकराया
ख़ुद ही को मायूब लिक्खा है
रात ने दिन को लिखे ख़त में
निकली हूँ मैं डूब लिक्खा है
रूह पर्दे में बदन के है
इश्क़ को महजूब लिक्खा है
बोझ बनकर ज़िंदगी ने अब
माथे पर मस्लूब लिक्खा है
— Naresh Gund















