Naresh Gund

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@Naresh_Gund

Naresh Gund shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Naresh Gund's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

Ghazal

दैरो-हरम से दूर खड़ा है अनाथ इक बच्ची सा मिस्रा उस को अपने गोदी ले कर खेल रहा माई सा मिस्रा सबके इतने मालिक है अब, जात-धरम में बंटे हुए रब होंठों पर मेरे आ जाए कबीर-सा, साई-सा मिस्रा भूख, ग़रीबी, बेकारी को, रुक्नों में मैं ने जो बोया काग़ज़ पर मेरे लहराया, गेहूॅं की बाली सा मिस्रा सबने अपनी रोटी सेंकी, औरों की मुफ़त चिताओं पर मैं ने भी लफ़्ज़ों को गूॅंथा, बेल दिया रोटी सा मिस्रा महफ़िल में नेता बैठे हैं, ताली-वाली बजा रहे हैं कुत्तों की तारीफ करूँॅंगा, डालूॅंगा बोटी सा मिस्रा दिल में जो इतना ग़ुस्सा है, दुनिया की तल्ख़ी जीने में तहज़ीब तोड़ कर ग़ज़लों की मैं लिख दूँ गाली सा मिस्रा ग़ज़लों ने परवाज़ भरी जो, छोड़ दिया एहसास का पेड़ हाथ हिलाते रह जाता है मानी के डाली सा मिस्रा — Naresh Gund
साथ होकर भी हमेशा दूर पाया है तुझे है ख़ता मेरी कि मैं ने आज़माया है तुझे रोज़ ही करता रहा मैं रक़्स तेरी याद में टूटने तक तार दिल के रोज़ गाया है तुझे अजनबी बन कर मिलूँगा जब मिलूँगा फिर कभी सोच कर ये बात मुश्किल से भुलाया है तुझे मुद्दतों के बा'द उतरी है ज़मीं पर चाँदनी ख़्वाहिशों का तोड़ कर गुल्लक, बुलाया है तुझे क्या बताऊँ किस क़दर खाती है उस को बेबसी रोज़गारी के लिए जो छोड़ आया है तुझे चाँद सा महबूब पा कर ये कभी मत भूलना चाँद की लोरी सुना माँ ने सुलाया है तुझे आग में जल कर मिला क्या बोल दो सीते ज़रा रावणों को छोड़ कर हम ने जलाया है तुझे — Naresh Gund
आप कहो क्या ग़ज़ल लिखूँ मैं, जब हो आप ग़ज़ाला बिल्कुल गीले बालों में लगते हो, मय का जैसे प्याला बिल्कुल ठीक नहीं हालात जरा भी, होंठों पे मुस्कान सदा पर तुम ने पूछा अच्छे से हो?, मैं ने भी कह डाला, बिल्कुल हर कोशिश बेकार पड़ गई, कुछ कर लूँ मैं छूट न पाऊँ तेरा इश्क़ लगे मुझ को तो मकड़ी का है जाला बिल्कुल अक्स मिरा तुझ में उतरा है, देख जरा मेरी आँखों से तेरे कांधे पर जो तिल है, मेरी तरहा काला बिल्कुल अब मेरा क्या मुझ में बाक़ी, तेरा-मेरा क्या करते हो मैं ख़ुद तेरे नाम हुआ हूँ, तेरे नाम क़बाला बिल्कुल इक दूजे से हैराँ क्यूँ हैं, दोनों में अँधियारा क्यूँ है बाहों में भर ले मुझ को जो, हो भरपूर उजाला बिल्कुल — Naresh Gund
सबकी अपनी चाल अलग है दुनिया का भी हाल अलग है क़िस्मत जैसे के तैसे है दिन वैसे ही, साल अलग है चेक-मेट राजा को कर दे इस प्यादे की चाल अलग है पैसों पर नाचे हर बुलबुल हर सिक्के का ताल अलग है गेंडे की चमड़ी शर्माएँ इन्सानों की खाल अलग है कुर्सी से चिपके बैठे हैं तशरीफ़ों पर राल अलग है गड़बड़ घोटालों की नगरी कलियुग है, ये काल अलग है इक थाली के चट्टे-बट्टे काली सबकी दाल, अलग है सारे फूलों को चूमो तुम पर मेरा ये गाल अलग है मेरा जिस सेे गला कटा है सच कहता हूँ बाल अलग है ग़ुस्सा, क़ुर्बानी-ओ-चाहत अपना अपना लाल अलग है सबकी नज़रों में नाकारा माँ को अपना लाल अलग है — Naresh Gund