शरीफ़ुन्नफ़्स की जब भी हमें मस्ती सताती है
हमारे गाँव की इक टूटी बस्ती याद आती है
तमाशा आदतन करते हो तुम नाहक़ निवालों का
तुम्हारी देह कब पाँवों को यूँ चादर बनाती है
है नंगा जिस्म बच्चों का किसी दर माँ भी नंगी है
ग़रीबी किस तरह से जिस्म पर रोटी पकाती है
उन्हीं गलियों में दो बच्चों को ले कर मर गई फुनिया
वो कहती थी उसे अब भूख से बदबू सी आती है
उसी दुनिया के ही इंसान की हैवानियत तौबा
ये दुनिया जो कि पत्थर में ख़ुदा का घर बसाती है
तुम्हारा रहनुमाओं तख़्त जाएगा यक़ीं मानो
हज़ारों फूल सह
में हैं कली जब मसली जाती है
ग़ज़ल-गो यार अब तो ये ग़ज़ल भी इक बग़ावत हो
हमारे देश की बेटी तो अब दुनिया चलाती है















