उक्ता के कू-ए-यार से उश्शाक़ चल पड़े

कार-ए-वफ़ा के देखिए मुश्ताक़ चल पड़े

मैं उठ गया तो दर्द की महफ़िल उजड़ गई
मेरे ही साथ इश्क़ के मश्शाक़ चल पड़े

नक़्श-ए-क़दम पड़े हैं ये क़ुदरत के जा-ब-जा
दुनिया-ए-दिल से उठ के बद-अख़लाक़ चल पड़े

बर्ग-ए-हिना से लिख के नसीहत ज़मीन पर
गुलशन को तेरे छोड़ के औराक़ चल पड़े

रिश्तों के एहतिराम की जिन को न थी तमीज़
दामन में अपने बाँध के आफ़ाक़ चल पड़े

तेरी निगाह-ए-नाज़ ने ऐसा फ़ुसूँ पढ़ा
दीवाने हो के दुनिया से अशफ़ाक़ चल पड़े

मैं ने चराग़-ए-इश्क़ जलाए थे जो 'नदीम'
हमराह मेरे छोड़ के सब ताक़ चल पड़े

— Nirmal Nadeem

More by Nirmal Nadeem

Other ghazal from the same pen

See all from Nirmal Nadeem →

Gulshan Shayari

Shers of gulshan.

All Gulshan Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling