"गले से क्यूँ नहीं मिलते"

हबीब आ कर तुम अपने दिल-जले से क्यूँ नहीं मिलते
पुराने दोस्त हो तो फिर गले से क्यूँ नहीं मिलते

मुझे मालूम है मैं हूँ नहीं लाइक़ तुम्हारे पर
तुम्हें दरिया-ए-क़ीर-ए-चाव से लाया किनारे पर
उसी अंदाज़ या फिर हौसले से क्यूँ नहीं मिलते

ज़वानी बीत जाएगी तो फिर आने से क्या हासिल
फिर आ कर के मेरा ये दिल जला जाने से क्या हासिल
अभी आ कर के दिलकश मरहले से क्यूँ नहीं मिलते

फ़ज़ाओं में तुम्हारी साँसों की हैं ख़ुशबुएँ अब तक
तुम्हारी पैरहन-ए-इश्क़ के छुपते निशाँ कब तक
पलटकर 'इश्क़-ए-सादिक़ ज़लज़ले से क्यूँ नहीं मिलते

— Nityanand Vajpayee

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