हवाओं में मोहब्बत फैलकर नैरंग हो जाए
धड़कता दिल किसी का भी हो इस के संग हो जाए
मगस बनकर करो बारिश ज़रा शहद-ए-मोहब्बत की
क़िवाम-ए-इश्क़ से पुर जिस्म का हर अंग हो जाए
अगर तुम जैसे कट्टर-पंथियों की जान जाने से
रहेगा पंथ ख़ालिस तो फिर आओ जंग हो जाए
मैं अब्र-ए-इश्क़ हूँ तुम धूप सी गुज़रो सनम मुझ
में
धनक के सात रंगों सा हमारा रंग हो जाए
धड़कता है मगर उस के बिना मसरफ़ नहीं होता
दिल-ए-मजनूँ मिरा रब्बा न ज़ैल-ए-ज़ंग हो जाए
ख़ुदाया तुझ से भी ज़्यादा जिसे मैं मानता हूँ वो
दग़ा दे गर तो फिर उस पर ये दुनिया तंग हो जाए
'मिलन' इतनी तिलिस्माती है वो गर एक मिस्रे में
मैं उस का नाम जोड़ूँ तो ग़ज़ल आहंग हो जाए















