दोस्तो किस को ख़बर है वक़्त की रफ़्तार कितनी
दोस्ती-ओ-दुश्मनी के दरमियाँ दीवार कितनी
आज मंज़िल पर खड़ा हूँ तो सगा मैं हर किसी का
क्या बताऊँ दर-ब-दर मुझ को मिली दुत्कार कितनी
लुट रही फूलों की ख़ुशबू बाग़बाँ ख़ामोश बैठे
और देखो ज़ालिमों की क्यारियाँ गुलज़ार कितनी
इक दफ़ा जब से गई है बाल गीले वो झटककर
हो रही है खिड़कियों से नूर की बौछार कितनी
रंगतें उड़ने लगी हैं झुर्रियाँ पड़ने लगी हैं
हो चुकी माँ-बाप की भी अब कमर लाचार कितनी
खोजते फिरते हो क्यूँ वीरानियों में लोग तन्हा
आओ देखो महफ़िलों में इन की है भरमार कितनी
— Prashant Prakhar















