कह दे तो इंतिज़ार में सदियाँ गुज़ार दूँ
हक़ से अगर वो माँग ले कैसे न प्यार दूँ
मुझ पर मेरे हबीब के एहसान ख़ूब हैं
ऐसा कभी हो काश मैं एहसाँ उतार दूँ
मौला से सिर्फ़ एक ही मेरी ये आरज़ू
ले के मैं ग़म हर एक के ख़ुशियाँ उधार दूँ
मुझ को ख़िजाँ नसीब है तन्हा दरख़्त हूँ
तू ही बता कि मैं तुझे कैसे बहार दूँ
इस अंजुमन में आए हो रब की इनायतें
तुम को ग़ज़ल सुनाऊँ या दिल को क़रार दूँ
— Prashant Prakhar















