रुलाएगी बहुत ये ज़िंदगी इक दिन
करेगा फिर ख़ुदा की बंदगी इक दिन
यही था इक मुदब्बिर ने कहा मुझ से
डुबा देगी तुझे ये आशिक़ी इक दिन
ख़ुदा के सामने तू हाथ फैला दे
बुझा देगा वो तेरी तिश्नगी इक दिन
ज़रा सी दोस्ती सूरज से कर ले तू
मिटा देगा कभी वो तीरगी इक दिन
मिलेगा जब तुझे कोई भला राही
बदल देगा वो तेरी ज़िंदगी इक दिन
तू कर ले आप ही से दिल-लगी वर्ना
भुला देगी तुझे ये रफ़्तगी इक दिन
— Prashant Prakhar















