गाहे गाहे ख़ुद में आना हो जाता है
मेरा मुझ
में भी ठिकाना हो जाता है
रोज़ दिखता था जो आईने में मुझे
देख के अब उसे ज़माना हो जाता है
शौक़ को चाहे शुरू होता इश्क़ पर
आख़िरश आशिक़ दिवाना हो जाता है
कुछ नया होता है हर इक पल में यहाँ
और बाक़ी सब पुराना हो जाता है
उस तरफ़ आशुफ़्ता ही रहतीं लड़कियाँ
इस तरफ़ आशिक़ फ़साना हो जाता है
मेरे कर के आता था जो मेरी गली
मेरे दिखते अब रवाना हो जाता है
हम तो रह जाते हैं आने में सब जगह
जाने वालों का तो जाना हो जाता है
— Chetan Verma















