Chetan Verma

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@Parnidaa

Chetan Verma shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Chetan Verma's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

उस शहर-ए-नाकाम के बाशिंदे हैं हम जहाँ मिल कर के मुर्दे सभी ज़िंदा को दफ़नाते हैं — Chetan Verma
इस आसमाँ के ही सबब हम से हुई है हर ख़ता इस ने दिखाए ख़्वाब जैसे जानता कोई नहीं — Chetan Verma
आप तो कृष्ण हैं सब छोड़ के जा सकते हैं हम हैं राधा हमें तो प्रेम निभाना होगा — Chetan Verma
मैं सब से दूर जाना चाहता हूँ दिल-ए-मादूम पाना चाहता हूँ — Chetan Verma
और कहीं पे लगाने को काटा है इक पेड़ एक मकाँ और घर बनाना है लड़की को — Chetan Verma
इश्क़ के फंदे से यहाँ डरते हैं लोग लटका रहता हूँ मैं शब-ओ-रोज़ इस सेे — Chetan Verma
जग उठा हूँ रह-ए-ज़िंदा में सो जलना पड़े है मैं वगरना वो दिया हूँ जिसे ज़ुल्मत है पसंद — Chetan Verma
इक आँख सुकूँ है इक आँख आँसू है फ़लक पर चाँद भी और सूरज भी — Chetan Verma
डूबने का दम रखो और फिर देखो अगर जो समुंदर हो न जाए मोहब्बत यार की — Chetan Verma
भूल जाओगे उसे तो भी ख़लिश होगी ही जल भी जाए जो मकाँ फिर भी धुआँ रहता है — Chetan Verma
तू भी ग़म-ए-हयात का है मारा और मैं भी चल इश्क़ छोड़ दर्द का रिश्ता बनाते हैं — Chetan Verma
इश्क़ थोड़ा या ज़्यादा नहीं होता है या तो ये होता है या नहीं होता है — Chetan Verma
उस ने मुझ को देखा और इक शख़्स देखा मैं ने उस को देखा और इक दुनिया देखी — Chetan Verma
मक़ाम-ए-क़ैस के साथ अवाम-ए-तैश के साथ मैं निकला उस के दर से बड़ी ही ऐश के साथ — Chetan Verma
अच्छा तुम्हें एतराज़ रोने से भी अब मिरे ख़ंजर भी है घोंपना ख़ूँ भी नहीं चाहते — Chetan Verma
आता है मुझे फ़ासले से इश्क़ ब-ख़ूब वो चाँद मिरी पहली मोहब्बत थी सनम — Chetan Verma
रूह को गाँव की दहलीज़ पे रख कर इक बदन गया है शहर कमाने — Chetan Verma

Ghazal

मिरी शाम को मुयस्सर यूँँ तो आशियाँ नहीं है जो मैं सर उठा के देखूँ कहाँ आसमाँ नहीं है मुझे इश्क़ जो हुआ है किसी दर्द की दुआ है ज़रा गुफ़्तगू तो है पर कोई दास्ताँ नहीं है जो कुचल के चल रहे हैं गुलों को भी ग़ुॅंचों को भी वही करते हैं शिकायत यहाँ गुलसिताँ नहीं है वो जो चुप सी एक औरत तिरा ज़ुल्म सह रही है किसी फ़र्ज़ की है मारी कोई बेज़बाँ नहीं है इसी बात का तो डर है यूँँ ही ख़ाक हो न जाऊँ मिरे इश्क़ का अभी तक कोई मेज़बाँ नहीं है ये जहाँ को भी चला है तेरे दर पे आ के पहुँचा मेरे ग़म का और कोई यहाँ मेहरबाँ नहीं है तिरे हिज्र में रवाँ हूँ बना रिंद मैं यहाँ हूँ तिरे बा'द इश्क़ का अब कोई भी मकाँ नहीं है रह-ए-ज़िंदगी भी वो ही ग़म-ए-ज़िंदगी भी वो ही खिली धूप है अज़ा की कोई साएबाँ नहीं है — Chetan Verma
अपनी मर्ज़ी से कोई दूर कहाँ रहता है वक़्त का मारा हुआ शख़्स रवाँ रहता है बेड़ियाँ हाथ लिए तू जो यहाँ घूम रहा बेड़ियों में नबी ये इश्क़ कहाँ रहता है तू हुआ था मिरा औहाम यही काफ़ी है मैं हुआ हूँ तिरा ये मुझ को गुमाँ रहता है इक दफ़ा देख ले जो शख़्स उसे राहों में उस का ही रहता है वो शख़्स जहाँ रहता है भूल जाओगे उसे तो भी ख़लिश होगी ही जल भी जाए जो मकाँ फिर भी धुआँ रहता है दायरे दर्ज मोहब्बत में तभी होते हैं ज़ख़्मी ख़ुद्दारी का जब दिल में निशाँ रहता है इश्क़ बूढ़ा हुआ जाता है नई नस्लों में दिल के जज़्बे से ही हर इश्क़ जवाँ रहता है — Chetan Verma
रोते रोते आज हम ने फिर पुकारा है कोई वो अँधेरी रात का जलता सितारा है कोई देख लो तुम मेरी जानिब तो तुम्हें ये इल्म हो जो तुम्हारा था कोई अब भी तुम्हारा है कोई मेरे आईनों से गुम हैं अक्स मेरे देखना क्या तिरे आईनों में उन का नज़ारा है कोई काट ली है ज़िंदगी जब आधी तेरी याद में अब कहाँ तेरे सिवा मुझ को गवारा है कोई क्या सितम है आशिक़ी का आशिक़ों पे ये हुज़ूर शख़्स-ए-क़ुर्बत है कोई शख़्स-ए-गुज़ारा है कोई फिर उठा है इक नया शाइ'र वफ़ा की राह में या'नी फिर से इश्क़ ने मासूम मारा है कोई रतजगी में बैठ कर हूँ पूछता मैं रातभर कायनात-ए-पुर-ख़तर तेरा किनारा है कोई — Chetan Verma
इश्क़ थोड़ा या ज़्यादा नहीं होता है या तो ये होता है या नहीं होता है अब की नस्लों से पूरा नहीं होता है इश्क़ मुझ सेे अधूरा नहीं होता है क्यूँ रखें दिल भी गर इश्क़ करना न हो घर में अंधों के शीशा नहीं होता है हादसा ही तो है इश्क़ का होना भी हादसा जिस में बचना नहीं होता है हाथ जलता हुआ छोड़ना है सही ख़ुद की महफ़ूज़ी धोखा नहीं होता है शादमाँ में छिपा रहता है जुल कभी हर दिल-ए-शाद सादा नहीं होता है उस की जब से है मंदिर में शादी हुई अब वहाँ मुझ सेे सजदा नहीं होता है उस के अश्कों पे मत जा रे मासूम दिल रोता हर शख़्स सच्चा नहीं होता है पूछता है जो बस रौशनी में तुझे दोस्त वो अपना अपना नहीं होता है — Chetan Verma
दिल-ए-ख़ाक था मेरा ये बदन तिरे छूने से जो मचल गया गिरे अश्क तेरे जो जिस्म पे मिरा ख़ूँ नसों में उबल गया कई ख़्वाहिशें उठीं दिल में फिर कई चाह फिर से जवाँ हुए तेरे देखने से ही इक नज़र मिरा दिल ये फिर से उजल गया तिरी ज़ुल्फ़ें वज़ में रवाँ हुई मिरी रूह चैन से भर गई तू जिस ओर राह पे चल पड़ा मिरा चैन उस ओर निकल गया की जो तेरी साँसों से गुफ़्तुगू मुझे साँसें मेरी सुनाई दीं वो अज़ल शिकन मिरे चेहरे की तिरा शाज़ तिल ही निगल गया वो क़रीब था मेरे इस क़दर मिरा ज़ब्त था पड़ा बे-असर वो जो चाव मेरे लबों पे था वो लबों पे उस के उछल गया तेरी याद का ही चराग़ था जगा जिस के नूर से घर मेरा शब-ए-इंतिज़ार के आख़िरश घर उसी चराग़ से जल गया — Chetan Verma
रहगुज़र अब तेरी ख़िदमत नहीं होगी मुझ सेे ख़्वाब-ए-मंज़िल की इबादत नहीं होगी मुझ सेे सोचूँ उम्मीद से तो ख़ौफ़ ये भी आता है क़ुर्ब-ए-मंज़िल ही तो ग़फ़लत नहीं होगी मुझ सेे आलम-ए-रंज में बेकार है फ़ुर्सत का पढ़ा हिज्र में ज़ब्त से निस्बत नहीं होगी मुझ सेे चाहतों का ये नया दौर डरा देता है चलती फिरती हुई चाहत नहीं होगी मुझ सेे हासिल-ए-इश्क़ है तमगा-ए-ख़ुदा पर इस की टूटे दिल से तो इबादत नहीं होगी मुझ सेे इक़्तिज़ा है वफ़ा वालों में वफ़ादारी का इस तलब तो कोई राहत नहीं होगी मुझ सेे पा-ब-जौलाँ है यक़ीं दर्द की जंजीरों से रब्त की अब कोई हसरत नहीं होगी मुझ सेे पैरवी कर रहे हैं लोग सराबों की यहाँ अक़्ल अपनी की ये ज़िल्लत नहीं होगी मुझ सेे — Chetan Verma

Nazm

"दीद-ए-यार" उतरी ज़ुल्फ़ें यकायक यूँँ लहराती हुई जिस्म पर उस के जैसे रात ने अँधेरे का दरिया खोला हो साहिल पर कहाँ तक बचाता मैं नज़रें अपनी कि हर तरफ़ वो था अक्स था उस का कि हर साँस में ख़ुशबू थी उस की हर आवाज़ में हँसती वो रही वो दरख़्त जो छुए उस ने चलने लगे वो दरिया जो छुआ सागर से पिया न गया वो बैठा जिस डगर मंज़िल हो गई मुसाफ़िरों की वो जब सोया रात हो गई दिन दो-पहरी तितलियों ने रंग बदल दिए उस की हँसी पर फूल उस. की ख़ुशबू से महकने लगे मेरी सारी हक़ीक़तें बदल दी उस ने मेरे सारे अरमाँ अपने नाम कर दिए मैं रहा नहीं वो जिसे सुब्ह आईने में देख कर आया था अब मैं कोई और था और था किसी और का — Chetan Verma
"एक लड़की" राह-ए-आम पे चलती वो एक तन्हा लड़की हज़ारों आँखें जिस की ग़फ़लत की ताक में हैं हज़ारों हाथ उसे छूने की कोशिश में बढ़ते हैं हर दिन हर दिन वो हाथ काटे जाते हैं नए दिन नए हाथों से बदले जाते हैं तन्हा होकर भी तन्हाई नहीं हासिल उसे अपनी आह की भी सुनवाई नहीं हासिल उसे किसी ग़ज़ाल सी घूमती ये मासूम लड़की जिस पे ध्यान है पूरे जंगल का जंगल के वहशी समाँ का हवा का अब्र का आसमाँ का सब इसे चाहते हैं ये लड़की सब को चाहिए पर इसे क्या चाहिए क्या चाहिए इसे चाहिए एक पाक कोशिश जिस में जिस्म की हवस न हो चाहिए वो आँखें जो देखे सितारे उस की आँखों के वो आँखें जो देख सके दुनिया वैसे जिस तरह उस की अपनी आँखें देखती हैं जो पहचाने उस में छुपी हुई उस छोटी सी शरारत भरी बच्ची को जिसे दुनिया की घूरती डराती नज़रों ने वक़्त से पहले बड़ा कर दिया उसे चाहिए वो आँखें जो उसे छाँव दे अमान दे, रज़ा दे, वजह दे, रंग दे, ख़्वाब दे, सवाब दे और तसल्ली दे उस के बेबाकपन को बेबाक रहने की हिफ़ाज़ती एहसास दे कि कोई अपना देख रहा है इस गहराते अँधेरे में पर्दा दे दुनिया की नाजायज़ बसीरत से बेसूद बातों से तानों से तोहमतों से उसे चाहिए वो दिल जो खनकने दे उस की पायल उस के झूमके उस के कंगन जिस तौर भी वो खनकना चाहते हैं चमकने दे उस के पैरहन जिस तौर भी वो चमकना चाहते हैं जो आज़ाद रक्खे उस के होंठों की लाली उस की आँखों का मस्कारा उस के नाख़ूनों के ख़द-ओ-ख़ाल को वो हो तो उस के शाद बदन में झिझक न हो किसी सवालात को ले कर किसी हालात को ले कर वो आँखें जो उसे वो आज़ादी दे सके जो रुकी पड़ी है जाने कितनी सदियों से कितने समाजों से उसे चाहिए वो शख़्स जो बाँटे वो राज़ जो सिर्फ़ उस के दर-ओ-दीवार जानते हैं वो राज़ जिस सेे खेलते हैं उस के ख़यालात तो उस में एक अलग हुनर आता है नक्श-कार का जो एक नई दुनिया बनाती है एक मुकम्मल परिवार बनाती है उसे ख़्वाहिश है उस हाथ की जो उस का बदन छूने से पहले उस की रूह से तज़्किरा करे उस के बाल-ओ-पर सँवारे वो ज़ेहन जो उठाए उस की मर्ज़ियाँ उस की नादानियाँ उस की आसूदगी उस की अफ़सुर्दगी वो ठोकर खाए गिरे तो वो हाथ उस का सहारा बने वो खिलकर उड़े तो परवाज़ दे उसे वो सोए तो उस के सोते चेहरे पे पड़ती ज़ुल्फ़ का एहतियात करे रुख़्सार सहलाए और चूम के पेशानी इस्तिकबाल करे उस की मासूमियत का उस के भरोसे का उसे ख़्वाहिश है उस रूह की जो उस की रूह को पूरा करे सवेरा करे उस के ख़्वाबों का और ज़्यादा कुछ न हो पाए अगर तो कम अज़ कम उस का उस के वजूद उस के यक़ीन उस की क़ुर्बानियों का लिहाज़ करे — Chetan Verma
तुम आ जाना माने जो कभी दिल तेरा तो आ जाना फिर से उस मंज़िल पर जिस को रस्ता समझा था मैं ने उन रस्तों पर जो बह गए हैं मजबूरियों के सैलाब में कहीं आ जाना उन सियाही रातों में जो ज़िंदा थीं नाचते मोर सी आ जाना उन बाग़ों में जहाँ ख़ुशबू अब भी तेरी हँसी की है जहाँ दमकता है अंश तेरा एक सूक्ष्म सूरज सा आ जाना मेरी बाहों में जो लाश सी बिछी रहती हैं तेरी याद में मेरा सीना जो धड़कता तो है पर मायूस है सर्द रात सा मेरी आँखें जो देखना भूल रही हैं धीमे-धीमे सजाए हुए आँसू जिन में प्रतिबिम्ब तेरे हँसते साए का है आ जाना उस झील किनारे जिसे प्यास है तेरे छलकते नंगे पैरों की आ जाना उस चाँद तले जो कभी फिर से वैसा रौशन न हुआ उस चाँदनी में जो छाई नहीं उन रातों की तरह फिर कभी आ जाना उस दहलीज़ जिसे अपना बनाने की ख़्वाहिश रखी थी तुम ने वो दहलीज़ जिस ने सिर्फ़ तुम्हें अपना माना है आ जाना उस उजाड़ कमरे में जो बा'द तेरे सजाया न गया उस खिड़की जो अब भी मायूस है तेरे हिज्र में चादर जो भूली नहीं है तेरी छुअन आ जाना दुनिया के उस आख़िरी कोने में जिस में सिर्फ़ हम थे इश्क़ था हमारा हम रहेंगे और इश्क़ रहेगा हमारा आ जाना तुम बस आ जाना आख़िरी पल तक काएनात के मुझे इंतिज़ार रहेगा तुम बस आ जाना — Chetan Verma