तुम को मैं याद भी आख़िर नहीं आया या'नी
तो जतन सारा गया है मेरा ज़ाया' या'नी
बोसा तस्लीम-ए-मोहब्बत नहीं होता है क्या
तुम ने होंठों से लगाया था पराया या'नी
तेरे नाख़ून चबाने का सबब जानता हूँ
आज फिर मुझ से है कुछ तू ने छुपाया या'नी
इश्क़ से यूँ ही नहीं उठता भरोसा किसी का
धोखा तुम ने भी कभी इश्क़ में खाया या'नी
टूटना सब को है दस्तूर यही कहता है
तोड़ने के लिए ही सब है बनाया या'नी
आज फिर नींद को तरसी मिरी आँखें 'चेतन'
आज फिर टूट के वो याद है आया या'नी
— Chetan Verma















