फिर से इंसान मोहब्बत के बनाए जाएँतजरबे मीर व ग़ालिब के सुनाए जाएँशहर की साख़्ता गलियों में हवस का क़ब्ज़ाहीर-राँझों के नए शहर बसाए जाएँख़ुद-कुशी ही रहे बस आख़िरी चारा इनकोफ़ाज़िलों इतने भी आशिक़ न सताए जाएँबारहा मुश्किलें आएँ तो ही अच्छा वरनाहाल फ़ीरोज़ परिंदों के दिखाए जाएँ— Chetan Verma