मसाफ़त से वफ़ा का हाल अच्छा था
मुसाफ़िर फाँसने को जाल अच्छा था
अगर जो इश्क़ तेरी मौज ऐसी है
मोहब्बत फिर तो मैं बेहाल अच्छा था
मिले थे पहली पहली बार जब तुम से
जवानी का वही इक साल अच्छा था
गए दिन देर तक थाली को देखा बस
मिरे खाने में तेरा बाल अच्छा था
मिरी बे-ख़्वाब आँखें मुझ से कहती हैं
कि कंबल से तेरा रूमाल अच्छा था
महल जब लूट लेंगे तेरी सब ख़ुशियाँ
तू जानेगा तिरा कंगाल अच्छा था
ये क्या पानी सा बहता है रगों में अब
दिवानों रंग-ए-ख़ूँ तो लाल अच्छा था
मकान-ए-शहर बैठे सोचते हैं हम
नदी के पास का तिरपाल अच्छा था
— Chetan Verma















