तुम आ जाना

माने जो कभी दिल तेरा
तो आ जाना फिर से
उस मंज़िल पर जिस को
रस्ता समझा था मैं ने
उन रस्तों पर जो बह गए हैं
मजबूरियों के सैलाब में कहीं
आ जाना उन सियाही रातों में
जो ज़िंदा थीं नाचते मोर सी
आ जाना उन बाग़ों में
जहाँ ख़ुशबू अब भी
तेरी हँसी की है
जहाँ दमकता है अंश तेरा
एक सूक्ष्म सूरज सा
आ जाना मेरी बाहों में
जो लाश सी बिछी रहती हैं
तेरी याद में
मेरा सीना जो धड़कता तो है
पर मायूस है सर्द रात सा
मेरी आँखें जो देखना भूल रही हैं
धीमे-धीमे
सजाए हुए आँसू
जिन
में प्रतिबिम्ब
तेरे हँसते साए का है
आ जाना उस झील किनारे
जिसे प्यास है तेरे
छलकते नंगे पैरों की
आ जाना उस चाँद तले
जो कभी फिर से वैसा
रौशन न हुआ
उस चाँदनी में
जो छाई नहीं
उन रातों की तरह
फिर कभी
आ जाना उस दहलीज़
जिसे अपना बनाने की
ख़्वाहिश रखी थी तुम ने
वो दहलीज़ जिस ने
सिर्फ़ तुम्हें अपना माना है
आ जाना उस उजाड़ कमरे में
जो बा'द तेरे सजाया न गया
उस खिड़की
जो अब भी मायूस है तेरे हिज्र में
चादर जो भूली नहीं है तेरी छुअन
आ जाना दुनिया के उस आख़िरी कोने में जिस
में सिर्फ़ हम थे
इश्क़ था हमारा
हम रहेंगे
और इश्क़ रहेगा हमारा
आ जाना तुम बस आ जाना
आख़िरी पल तक काएनात के मुझे इंतिज़ार रहेगा
तुम बस आ जाना

— Chetan Verma

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