दिल-ए-ख़ाक था मेरा ये बदन तिरे छूने से जो मचल गया
गिरे अश्क तेरे जो जिस्म पे मिरा ख़ूँ नसों में उबल गया
कई ख़्वाहिशें उठीं दिल में फिर कई चाह फिर से जवाँ हुए
तेरे देखने से ही इक नज़र मिरा दिल ये फिर से उजल गया
तिरी ज़ुल्फ़ें वज़ में रवाँ हुई मिरी रूह चैन से भर गई
तू जिस ओर राह पे चल पड़ा मिरा चैन उस ओर निकल गया
की जो तेरी साँसों से गुफ़्तुगू मुझे साँसें मेरी सुनाई दीं
वो अज़ल शिकन मिरे चेहरे की तिरा शाज़ तिल ही निगल गया
वो क़रीब था मेरे इस क़दर मिरा ज़ब्त था पड़ा बे-असर
वो जो चाव मेरे लबों पे था वो लबों पे उस के उछल गया
तेरी याद का ही चराग़ था जगा जिस के नूर से घर मेरा
शब-ए-इंतिज़ार के आख़िरश घर उसी चराग़ से जल गया















