रोते रोते आज हम ने फिर पुकारा है कोई
वो अँधेरी रात का जलता सितारा है कोई
देख लो तुम मेरी जानिब तो तुम्हें ये इल्म हो
जो तुम्हारा था कोई अब भी तुम्हारा है कोई
मेरे आईनों से गुम हैं अक्स मेरे देखना
क्या तिरे आईनों में उन का नज़ारा है कोई
काट ली है ज़िंदगी जब आधी तेरी याद में
अब कहाँ तेरे सिवा मुझ को गवारा है कोई
क्या सितम है आशिक़ी का आशिक़ों पे ये हुज़ूर
शख़्स-ए-क़ुर्बत है कोई शख़्स-ए-गुज़ारा है कोई
फिर उठा है इक नया शाइ'र वफ़ा की राह में
या'नी फिर से इश्क़ ने मासूम मारा है कोई
रतजगी में बैठ कर हूँ पूछता मैं रातभर
कायनात-ए-पुर-ख़तर तेरा किनारा है कोई
— Chetan Verma















