मैं शीशों से शीशा छुपाता फिरता हूँ
अब ख़ुद से ही नज़रें चुराता फिरता हूँ
डर फिर उठा है टूटने का इक दफ़ा
अपना भरम सच से बचाता फिरता हूँ
यादें भी उस की रूठ जाएँ उस की मिस्ल
ख़ुद को तसलसुल मैं सताता फिरता हूँ
थी आरिज़ा ऐश-ओ-तरब की भी उसे
सो ऐश गाहों को जलाता फिरता हूँ
है नूर उस का ख़ुर्द बाक़ी मुझ
में ही
सो ख़ुद ही ख़ुद को अब बुझाता फिरता हूँ
लगने लगा है डर मोहब्बत से मुझे
सो दिल मैं सबका ही दुखाता फिरता हूँ
हर रात मुझ को आख़िरी सी लगती है
हरसज मैं क़ब्रें बनाता फिरता हूँ
— Chetan Verma















