सो गया फिर आज कोई रोते रोते
हो गई थी रात यूँ ही रोते रोते
कैसा मेरा ये तअल्लुक़ दर्द से है
गुज़री हर इक साँस मेरी रोते रोते
क्या हूँ मैं बरसात का बादल जो मेरी
ज़िंदगी बीतेगी यूँ ही रोते रोते
ये अज़िय्यत तालिब-ए-दीदार की जो
आँखें सोती भी हैं मेरी रोते रोते
— Chetan Verma















