टूट कर वापस सितारे घर नहीं जाते
सोच कर ये हम हमारे घर नहीं जाते
इस लिए भी जंग से मुझ को अदावत है
कितनी ही माँओं के प्यारे घर नहीं जाते
जब दिया है घर सभी को ऐ ख़ुदा फिर क्यूँ
सुब्ह घर से निकले सारे घर नहीं जाते
कुछ तो अब मन भी नहीं जाने का और कुछ हम
अपनी इस ग़ुर्बत के मारे घर नहीं जाते
मुंतज़िर हैं ये किसी राही के तेरी तरह
तो ही 'चेतन' ये किनारे घर नहीं जाते
— Chetan Verma















