अपनी मर्ज़ी से कोई दूर कहाँ रहता है
वक़्त का मारा हुआ शख़्स रवाँ रहता है
बेड़ियाँ हाथ लिए तू जो यहाँ घूम रहा
बेड़ियों में नबी ये इश्क़ कहाँ रहता है
तू हुआ था मिरा औहाम यही काफ़ी है
मैं हुआ हूँ तिरा ये मुझ को गुमाँ रहता है
इक दफ़ा देख ले जो शख़्स उसे राहों में
उस का ही रहता है वो शख़्स जहाँ रहता है
भूल जाओगे उसे तो भी ख़लिश होगी ही
जल भी जाए जो मकाँ फिर भी धुआँ रहता है
दायरे दर्ज मोहब्बत में तभी होते हैं
ज़ख़्मी ख़ुद्दारी का जब दिल में निशाँ रहता है
इश्क़ बूढ़ा हुआ जाता है नई नस्लों में
दिल के जज़्बे से ही हर इश्क़ जवाँ रहता है
— Chetan Verma















