रहगुज़र अब तेरी ख़िदमत नहीं होगी मुझ सेे
ख़्वाब-ए-मंज़िल की इबादत नहीं होगी मुझ से
सोचूँ उम्मीद से तो ख़ौफ़ ये भी आता है
क़ुर्ब-ए-मंज़िल ही तो ग़फ़लत नहीं होगी मुझ से
आलम-ए-रंज में बेकार है फ़ुर्सत का पढ़ा
हिज्र में ज़ब्त से निस्बत नहीं होगी मुझ से
चाहतों का ये नया दौर डरा देता है
चलती फिरती हुई चाहत नहीं होगी मुझ से
हासिल-ए-इश्क़ है तमगा-ए-ख़ुदा पर इस की
टूटे दिल से तो इबादत नहीं होगी मुझ से
इक़्तिज़ा है वफ़ा वालों में वफ़ादारी का
इस तलब तो कोई राहत नहीं होगी मुझ से
पा-ब-जौलाँ है यक़ीं दर्द की जंजीरों से
रब्त की अब कोई हसरत नहीं होगी मुझ से
पैरवी कर रहे हैं लोग सराबों की यहाँ
अक़्ल अपनी की ये ज़िल्लत नहीं होगी मुझ से















