"बेबसी"
मोहब्बत की मेरी देखो बेबसी कितनी है
किसी कटते हुए पेड़ की टहनियों जितनी हैं
उस की ज़ुल्फ़ आन पड़ी है चेहरे पर
और मैं हूँ कि उन्हें हटा नहीं पा रहा
जले जा रहा हूँ आतिश-ए-मोहब्बत में उस की
क्या सितम है कि उसे कुछ बता नहीं पा रहा
वो सामने आ कर खड़ी हो भी जाए अगर
सामने उस के मैं चला भी जाऊँ मगर
नफ़स रुक जाएगी ज़बाँ कुछ न कह पाएगी
आगे बढ़ाएगी वो हाथ मिलाने को
बहती हुई एक महक आएगी
मैं तर जाऊँगा
गल जाऊँगा
मर जाऊँगा
छू लिया जो उसे एक बार या-रब तो फिर
कैसे मैं घर जाऊँगा
— Chetan Verma















