"एक लड़की"

राह-ए-आम पे चलती वो एक तन्हा लड़की
हज़ारों आँखें जिस की ग़फ़लत की ताक में हैं
हज़ारों हाथ उसे छूने की कोशिश में बढ़ते हैं हर दिन
हर दिन वो हाथ काटे जाते हैं
नए दिन नए हाथों से बदले जाते हैं

तन्हा होकर भी तन्हाई नहीं हासिल उसे
अपनी आह की भी सुनवाई नहीं हासिल उसे
किसी ग़ज़ाल सी घूमती ये मासूम लड़की
जिस पे ध्यान है पूरे जंगल का
जंगल के वहशी समाँ का
हवा का अब्र का आसमाँ का
सब इसे चाहते हैं
ये लड़की सब को चाहिए
पर इसे क्या चाहिए
क्या चाहिए इसे

चाहिए एक पाक कोशिश
जिस
में जिस्म की हवस न हो
चाहिए वो आँखें जो देखे सितारे उस की आँखों के
वो आँखें जो देख सके दुनिया वैसे
जिस तरह उस की अपनी आँखें देखती हैं
जो पहचाने उस
में छुपी हुई उस छोटी सी शरारत भरी बच्ची को
जिसे दुनिया की घूरती डराती नज़रों ने
वक़्त से पहले बड़ा कर दिया
उसे चाहिए वो आँखें
जो उसे छाँव दे अमान दे, रज़ा दे, वजह दे, रंग दे, ख़्वाब दे, सवाब दे
और तसल्ली दे उस के बेबाकपन को बेबाक रहने की
हिफ़ाज़ती एहसास दे कि कोई अपना देख रहा है इस गहराते अँधेरे में
पर्दा दे दुनिया की नाजायज़ बसीरत से
बेसूद बातों से तानों से तोहमतों से

उसे चाहिए वो दिल
जो खनकने दे उस की पायल उस के झूमके उस के कंगन
जिस तौर भी वो खनकना चाहते हैं
चमकने दे उस के पैरहन जिस तौर भी वो
चमकना चाहते हैं
जो आज़ाद रक्खे
उस के होंठों की लाली उस की आँखों का मस्कारा उस के नाख़ूनों के ख़द-ओ-ख़ाल को वो हो तो उस के शाद बदन में
झिझक न हो किसी सवालात को ले कर
किसी हालात को ले कर
वो आँखें जो उसे वो आज़ादी दे सके
जो रुकी पड़ी है जाने कितनी सदियों से
कितने समाजों से
उसे चाहिए वो शख़्स
जो बाँटे वो राज़ जो सिर्फ़ उस के दर-ओ-दीवार जानते हैं
वो राज़ जिस से खेलते हैं उस के ख़यालात
तो उस
में एक अलग हुनर आता है
नक्श-कार का जो एक नई दुनिया बनाती है
एक मुकम्मल परिवार बनाती है
उसे ख़्वाहिश है उस हाथ की जो उस का बदन छूने से पहले उस की रूह से तज़्किरा करे
उस के बाल-ओ-पर सँवारे
वो ज़ेहन जो उठाए उस की मर्ज़ियाँ उस की नादानियाँ
उस की आसूदगी उस की अफ़सुर्दगी
वो ठोकर खाए गिरे
तो वो हाथ उस का सहारा बने
वो खिलकर उड़े
तो परवाज़ दे उसे
वो सोए तो उस के सोते चेहरे पे पड़ती ज़ुल्फ़ का एहतियात करे
रुख़्सार सहलाए
और चूम के पेशानी इस्तिकबाल करे उस की मासूमियत का
उस के भरोसे का

उसे ख़्वाहिश है
उस रूह की जो उस की रूह को पूरा करे
सवेरा करे उस के ख़्वाबों का
और ज़्यादा कुछ न हो पाए अगर
तो कम अज़ कम
उस का
उस के वजूद
उस के यक़ीन
उस की क़ुर्बानियों का
लिहाज़ करे

— Chetan Verma

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