हम हैं तबह इस दश्त कैसे जानता कोई नहीं
जो है सबब रोने का ऐसे जानता कोई नहीं
इन रहज़नों के शहर में दिल यूँ खुला ही छोड़ कर
कब किस ने लूटा दिल ये कैसे जानता कोई नहीं
नज़दीकियाँ तो कम न थीं ऐसे भुलाने के लिए
मातम से सब गुज़रे हैं जैसे जानता कोई नहीं
फिरते हवस सीने लिए आशिक़ सियाने दौर के
बोसा अदा करते हैं कैसे जानता कोई नहीं
इस आसमाँ के ही सबब हम से हुई है हर ख़ता
इसने दिखाए ख़्वाब जैसे जानता कोई नहीं
यूँ हाथ बैठे हैं पकडकर सब ख़ुशी की रात में
दौरानिया दुश्वारी वैसे जानता कोई नहीं
— Chetan Verma















