इश्क़ कर के भी ग़म नहीं जाता
या'नी मर के भी दम नहीं जाता
आशिक़ी कम से कम तू तो चली जा
दिल से गर वो सनम नहीं जाता
तेरी हिजरत के बा'द ऐ ज़ालिम
उस गली में क़दम नहीं जाता
आता बहती हुई नदी जैसे
आ के वापस हरम नहीं जाता
उस ने आना नहीं है लौट के पर
क्या करें ये भरम नहीं जाता
— Chetan Verma















