दिल मिरा इश्क़ से कुछ बैर लिए बैठा है
बे-वफ़ाई का कोई जाम पिए बैठा है
ज़िंदगी जीता बड़े चाव से था दीवाना
अपने ही ख़ून का इल्ज़ाम लिए बैठा है
चाहता है वो अँधेरे के सिवा कुछ भी नहीं
दिल जो अपना किसी साए को दिए बैठा है
ज़ेर-ए-उम्मीद कोई दब रहा धीरे धीरे
आसमाँ कब से वो ही सर पे लिए बैठा है
मुद्दतों बा'द यहाँ ग़ैर महक है छाई
मुद्दतों बा'द कोई फूल लिए बैठा है
हाथ भी हम ने लगाया न था मय को 'चेतन'
शीशे में कौन है जो इतनी पिए बैठा है
— Chetan Verma















