हो सफ़र तन्हा तो मंज़िल भी फ़ज़ीता लगती है
साथ में गर हो शजर, छाया मसीहा लगती है
ग़म में अक्सर मुस्कुराना ओ ख़ुशी में टूटना
ज़िन्दगी हमको तो तू, बिल्कुल लतीफ़ा लगती है
अपनी नादानी से ही दिल, टूटता है बस मेरा
बाक़ी दुनिया हर दफ़ा ही, सिर्फ़ दुनिया लगती है
ज़िन्दगी के इक भँवर में डूबना सौ बार यूँँ
मौत की आहट मुझे अक्सर सफ़ीना लगती है
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