आया ख़याल देख के लहजे अलग अलग

रहना पड़ेगा अब से कि हाए अलग अलग

उस से जुदा हुए तो ये भी इल्म हो गया
इक जान दो बदन हुए कैसे अलग अलग

सारे दुखों को रो लिया इक रोज़ बैठ कर
इतना कहाँ था वक़्त कि रोते अलग अलग

पहले ज़बाँ दी बा'द ज़बाँ से पलट गया
किरदार एक शख़्स से निकले अलग अलग

जिस को मैं नें ये दिल दिया था एक बार में
लौटा रही है वो मुझे टुकड़े अलग अलग

मेरी पसंद और थी उस की पसंद और
इस वास्ते थे लाज़िमी रस्ते अलग अलग

उन से सवाल-ए-वस्ल भी करना फुज़ूल है
जो दोस्त भी हो और हो बैठे अलग अलग

— Prashant Sitapuri

More by Prashant Sitapuri

Other ghazal from the same pen

See all from Prashant Sitapuri →

Waqt Shayari

Shers of waqt.

All Waqt Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling