मैं तुम सेे बात कहना चाहता हूँ इक इजाज़त है

मगर फिर डर भी लगता है ये कहने में मोहब्बत है

अधर ख़ामोश रहते हैं निगाहें बात करती हैं
परी का हुस्न है उस का बला है वो क़यामत है

कि उस के नर्म लहजे को मैं उल्फ़त क्यूँ समझ बैठा
सभी से मुस्कुरा के बात करना उस की आदत है

कभी जो देखना हो तुम को क्या होता है ख़ालीपन
मेरी जानिब चले आना इधर ये ख़ूब दौलत है

दिलों की डोर का साथी ये कैसा खेल है जिस
में
किसी की मैं मोहब्बत हूँ कोई मेरी मोहब्बत है

— Prashant Sitapuri

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Rahbar Shayari

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