Prit
Prit
Nazm

"घर उस का"

सिरहाना ऊँचा होगा वहाँ
चादर भी मखमली होगी
फिर उस के बिस्तर पर तुम्हें नींद क्यूँ नहीं आती?
घर उस का मेरे घर से कई ज़्यादा महंगा है, बड़ा है
फिर तुम वहाँ चैन से क्यूँ नहीं रह पाती

वो दौलतमंद है, बड़ा आदमी है
तुम वहाँ ख़ुश रहोगी
मैं एक शाइ'र हूँ, पूरा कंगाल हूँ
मेरे घर आ कर क्या करोगी!
रोज़ ही कुछ नया तुम्हें वहाँ खाने मिलेगा
घर में मेरे दो वक़्त की रोटी भी नसीब ना हो
सब कुछ दे सकता है तुम्हें वो
मेरे पास प्यार के सिवा देने को कुछ भी नहीं
ये बात तुम क्यूँ नहीं समझ पाती!
घर उस का

घूमने का शौक है ना तुम्हें
वो दुनिया भर में घुमा सकता है
औकात है उस की
जो चाहिए तुम्हें ला कर दे सकता है
औकात है उस की
मेरी औकात तो तुम्हें पता ही है
मेरे एक हाथ में क़लम, दूसरे में दवाई है
हर पल बीमार रहता हूँ
ये तुम भी जानती हो
मेरी लाचारी, बेबसी को
तुम भी तो पहचानती हो
क्या पता मैं कब मर जाऊँ और इल्ज़ाम तुम्हारे सर आए
इस से पहले मुझे छोड़ कर
क्यूँ तुम चली नहीं जाती

— Prit

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