"इश्क़ "
ये इतना किस ने लिखा है इश्क़ पर
किस ने उकेरा है अपने महबूब को काग़ज़ पर
कितना दर्द भरा था उस के सीने में
क़लम भी रो रही थी उस के हाथों में
उसे पढ़ा नहीं जिया जाना चाहिए
इश्क़ लिखा नहीं , किया जाना चाहिए
वे लोग भी क्या ख़ूब थे
मौन मोहब्बत को भी कहानियों में लिख गए
मुकम्मल न हो सका इश्क़
फिर भी प्यार के अफ़साने दे गए
क़लम ही उन का सहारा रही थी
उन के अपने ज़ख़्म भी तो बे-वफ़ा हो गए
इश्क़ भी क्या ख़ूब चीज़ है
उन्हें बर्बाद कर के भी आबाद कर रखा है
— Pritam sihag















