किसी को दिन किसी को रात का ग़म है
यहाँ सब को किसी इक बात का ग़म है
तुम्हारे साथ रह कर भी अकेला हूँ
मुझे यारा इसी इक बात का ग़म है
तुम्हारे पास तो है बस तुम्हारा ग़म
हमारे पास मख़्लूका़त का ग़म है
कहे कुछ भी मगर सच तो यही है बस
उसे मेरे बुरे हालात का ग़म है
दिलासा तो बहुत तुम दे रहे मुझ को
पता भी है मुझे किस बात का ग़म है
— Kaviraj " Madhukar"















