Raj
Raj
Ghazal

कोई किसी की बाँहों में पूरा आ रहा था

कोई किसी के हाथों से निकले जा रहा था

वो जो किसी नज़र पे जी-जाँ से जा लगे थे
उन के लिए में जाँ-बर काजल बना रहा था

मेरा वो नाम ले के वापस से आ रही थी
मुझ को नज़र सराबों में सहरा आ रहा था

उस ने बिना पढ़े ही ख़त मेरे थे सँभाले
वो बे-वफ़ा रहा था पर बा-वफ़ा रहा था

मैं चुप करा रहा था वो रोए जा रही थी
वो चुप करा रही थी , मैं रोए जा रहा था

जब दूर कोई बन्दा सर्दी से मर गया था
तब दूर कोई बन्दा चादर चढ़ा रहा था

उस की यहाँ विदाई जब बरपा हो रही थी
तब कोई गाड़ियों में सोफ़े चढ़ा रहा था

— Raj

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