man ki tasalli ke li.e ik kaam main karta gaya | मन की तसल्ली के लिए इक काम मैं करता गया

  - Ravi 'VEER'

मन की तसल्ली के लिए इक काम मैं करता गया
हक़ में दुआएँ यार के हर शाम मैं करता गया

तर्क-ए-त'अल्लुक़ वो मुझे बदले में आँसू दे गए
फिर मयकशी में आँसुओं को जाम मैं करता गया

इतना कहाँ आसान है रातें सताती है मगर
अफ़्सोस रातें रोज़ उसके नाम मैं करता गया

जितना किया मैंने किया उसकी ख़ुशी के वास्ते
इस 'इश्क़ में ख़ुद को बहुत बदनाम मैं करता गया

मेरी ख़ता है 'वीर' मैंने मानकर उसको ख़ुदा
फिर की 'इबादत और दिल को धाम मैं करता गया

  - Ravi 'VEER'

Khushi Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Ravi 'VEER'

As you were reading Shayari by Ravi 'VEER'

Similar Writers

our suggestion based on Ravi 'VEER'

Similar Moods

As you were reading Khushi Shayari Shayari