gaav men jaana jaana shor sharaaba hai | गाँव में जाना जाना शोर शराबा है

  - Saahir

गाँव में जाना जाना शोर शराबा है
शायद वो फ़िर घर से बाहर निकला है

हम क़ैदी भी रिहा किए जाएँ इक दिन
हम लोगों को भी तो खुलकर जीना है

छोड़ रखा है सबकुछ दीवारों पे अब
इनको गिरना है या घर को रखना है

मुझ सेे इतनी मुहब्बत ठीक नहीं है अब
मुझको दो दिन जीना है फ़िर मरना है

आग लगा कर ये बोला शहज़ादी ने
पानी मत फेंको ये मुझको पीना है

ये आईना देख रहे हो ना तुम ये
आईना नहीं है ये मेरा कमरा है

सभी किताबें बिखेर डाली तुमने क्यूँ
कौन किताबों में अब ख़त को रखता है

मेरे बारे में इतना कहते हैं लोग
दूर रहो इस सेे ये ऐसा वैसा है

एक परीज़ादी से 'इश्क़ हुआ जब से
कदम कदम पे तब से डर है ख़तरा है

मौत सड़क पर राह देखती है मेरी
अबके गुजरा तो फ़िर मरना पक्का है

  - Saahir

Masti Shayari

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