sheeshe men insaan ka goya lagta hooñ | शीशे में इंसान का गोया लगता हूँ

  - Saahir

शीशे में इंसान का गोया लगता हूँ
शुक्र है इसको तो मैं बन्दा लगता हूँ

मेरे दिल से खेल गए जो मेरे दोस्त
उन लोगों को खेल-तमाशा लगता हूँ

कुछ आते हैं और चले जाते हैं फिर
उनको शायद रैन-बसेरा लगता हूँ

मुझको नाकामी ने ये बतलाया है
मैं किन किन लोगों को जाया लगता हूँ

ग़ुस्सा करने पर भी तू चुप रहता है
कौन है तू और मैं तेरा क्या लगता हूँ

जिस हिसाब से देख रहे हो मुझको तुम
ज़ाहिर है तुमको मैं अच्छा लगता हूँ

  - Saahir

Narazgi Shayari

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