मैं इक दिन मिल गया मुझको तो ख़ुद सेे बात की मैंने
तो क्या होता अगर जो की न होती दिल्लगी मैंने
कभी इक वक़्त था इक पल नहीं कटता था जिसके बिन
उसी इक शख़्स को खोकर गुज़ारी ज़िंदगी मैंने
तुम्हारी ज़िद थी मुझ सेे बात तक करनी नहीं तुमको
तुम्हारी ज़िद की ख़ातिर अपनी हर ज़िद छोड़ दी मैंने
तुम्हारे बाद मेरी जाँ कहीं तो दिल लगाना था
सो फिर इक रोज़ तन्हाई से करली दोस्ती मैंने
मेरी नज़्में मेरी ग़ज़ले ख़यालों तक में तुम ही हो
तुम्हारे छोड़ने पर ही चुनी ये शायरी मैंने
न कोई माँग थी मेरी न उसने ही दिया कुछ भी
बिना तनख़्वाह की है 'इश्क़ की ये नौकरी मैंने
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