izzat alag hi hoti hai phir dost yaar men | इज़्ज़त अलग ही होती है फिर दोस्त यार में

  - Rohit tewatia 'Ishq'

इज़्ज़त अलग ही होती है फिर दोस्त यार में
गर आदमी लगा हो किसी रोज़गार में

पहले तो सोचा ख़्वाब में आकर मिलोगी तुम
फिर नींद टूटने न दी इस इंतिज़ार में

वालिद ने काँधे पे मेरे क्या हाथ रख दिया
और चार चाँद लग गये तब से वक़ार में

करती थी रोज़ रोज़ सितम हमपे ज़िंदगी
मारा है मौत ने ही फ़क़त एक बार में

क़द में बड़ा हूँ इसलिए बस छाँव सबको दी
सूरज से वरना तेज हूँ मैं ताबदार में

हमको तो 'इश्क़ भी कई सौ बार है हुआ
इक बार भी नहीं था मगर इख़्तियार में

  - Rohit tewatia 'Ishq'

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