चाक से ज़ख़्मों के भीतर रौशनी सी आ रही है

है अजब रूहानियत जो मुझ में भरती जा रही है

दाॅंत हैं आए निकल इस रूह के कैसे अचानक
दर्द में हूँ मैं ये मुझ-को नोच कर के खा रही है

काट कर ये हर परत को पाक मुझ-को कर रही है
छाँट कर रातें मिरी रहमत नई बरसा रही है

तोड़ कर मेरे भरम आज़ाद मुझ-को कर दिया है
रूह मेरी उस ख़ुदा से एक होने जा रही है

— Rubball

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