दर्द बढ़ता है मगर रोने से मन भरता नहीं है
थी ग़लत-फ़हमी कि कोई इश्क़ में मरता नहीं है
मुँह छुपा के हो गया ग़ाएब कहीं मिलता नहीं वो
जो ये कहता था किसी भी शय से वो डरता नहीं है
थे बहुत दावे किए उस ने कि मेरा साथ देगा
आज लगता है कि जैसे प्यार वो करता नहीं है
तोड़ कर वो हर क़सम को सब्र से बैठा हुआ है
एक मैं हूँ जो मिरा उस के बिना सरता नहीं है
— Rubball















