ढोंग है ये आदमी का बे-वजह ही फ़िक्र करना
घर के मर्दों को गवारा है नहीं मेरा निखरना
शेरनी सी तर्बियत बेटी अगर पाए पिता से
बे-वजह है शे'र का फिर ख़ौफ़ खाना और डरना
ख़ुद करोगे क़ैद तुम औलाद अपनी जो क़फ़स में
सोग होगा उम्र का तुम सोच कर ये पर कतरना
जिस कली को था छुपा कर के रखा काँटों से तुम ने
नोच डालेगा ज़माना जब ये बस तुम आह भरना
जब नहीं मिलता सहारा घर से अपने बेटियों को
फिर मुनासिब है उन्हें सय्याद के हाथों से मरना
— Rubball















