ये हर शब की कहानी है मुझे सब से छुपानी है
मैं ख़ुद तक रख भी लूँ लेकिन मेरी आँखों में पानी है
अगर वो पूछ लेता तो ज़रा राहत मिली होती
वो कह कर के गया है फिर वही आदत पुरानी है
जो शामों में बहकती है जो सुब्हों में चहकती है
जो इक पल में बिख़र जाए वही तो ज़िंदगानी है
— Sakshi Saraswat















