जहाँ पर शाम से मिलती हुई इक भोर है शायद
वहीं पर उस के मेरे वस्ल का इक कोर है शायद
फ़क़त इक ख़्वाब में हूँ ख़्वाब हूँ या हूँ हक़ीक़त मैं
मेरी परवाज़ में उस का ही कोई ज़ोर है शायद
मैं उस को दूर से देखूँ तो लगता है सुकूँ जैसा
जो ख़ुद में झाँक कर देखूँ तो कोई शोर है शायद
तलब इतनी ज़ियादा है मगर उतनी ही है दूरी
मुझे और उस को बाँधे दिल की कोई डोर है शायद
वो मेरे रंग ले मुझ से मुझे ही रंग देता है
नहीं रंगरेज़ पर सीरत का कोई चोर है शायद
— Surendra Bhatia "Salil"















