पता जब तक नहीं पक्का हमारा
वही मंज़िल वही रस्ता हमारा
थी जिस से आस वो मुँह फेर बैठा
निकल पाया नहीं पर्चा हमारा
कहानी सुन के सब उठ ही रहे थे
किसी ने पढ़ लिया चेहरा हमारा
अभी बचपन के कुछ सपने हैं बाक़ी
अभी भारी है ये बस्ता हमारा
हमें हालात ने ऐसे निचोड़ा
लहू से बन गया ख़ाका हमारा
नज़र-अंदाज़ करना ही पड़ा फिर
कोई आशिक़ था बेचारा हमारा
समझती थी जो लड़की हम को पागल
वही तकती है अब रस्ता हमारा
तुम्हीं ने हम को सौदाई बनाया
मोहब्बत था नहीं पेशा हमारा
'सलिल' इक उम्र गुज़री अब तो शायद
नहीं करता हो वो चर्चा हमारा
— Surendra Bhatia "Salil"















