“बारिश”
ये बारिश जो अक्सर बरसती है मुझ पर
तुम्हारी भी ज़ुल्फ़ें भिगाती तो होगी
कभी चाय चुस्काते छज्जे पे बैठे
तुम्हें भी मेरी याद आती तो होगी
जो मैं ने तुम्हें पेश हसरत से की थी
किताब-ए-मुहब्बत निशानी वो मेरी
उसी के किसी इक सफ़्हे से गुज़रते
ग़ज़ल तुम मेरी गुनगुनाती तो होगी
करे सरसराहट ये जब भी तुम्हारे
बग़ीचे के पीपल के पत्तों को छू कर
तुम्हारी मेरी देर रातों की बातों
के एहसास फिर से दिलाती तो होगी
हुई एक मुद्दत था मेहमाँ किया तुम
को बेनागा आता है हर बार सावन
ये जैसे छुपाती है जज़्बात मेरे
तुम्हारे भी आँसू छुपाती तो होगी
— Surendra Bhatia "Salil"















